मैं 'देशभक्ति' हूँ
फटे हाल पड़ी-पड़ी चीख रही हूँ, 'देशभक्ति' हूँ,
उठी कहाँ हूँ, जागी नहीं हूँ, अभी तो मैं सोई पड़ी हूँ।
आज जो आज़ाद तुम घूम रहे हो ओ नादाँ
किसी ज़माने में इस आज़ादी के लिए कितना मैं लड़ी हूँ।
कहीं लेख तो कहीं बस कहानी बन चुकी हूँ,
मैं थक चुकी हूँ, हार गयी हूँ, बस मरी पड़ी हूँ,
शब्दों तक सिमित हूँ, चंद लोगो तक सिमित हूँ,
बाकी सभी का क्या जिनके इंतज़ार में मैं आज तक खड़ी हूँ।
साल भर में चंद दिनों ही सोशल मीडिया पे घूमती हूँ,
कइयों के ख्याल-ओ-ज़हन में आज भी नहीं हूँ।
मुझे शंका है अपने अस्तित्व पे, अपनी हाज़री पे,
कभी दिलों पे राज करती थी, आज वो ही मैं लाचार पड़ी हूँ।
आज़ादी मुझे भी दिलवा दो इस अधूरे प्यार और कुछ पलों की यादों से,
मैं सड़ रही हूँ गुलामी मैं 'मुशाईर' कई दिलो के अँधेरे कोने मैं पड़ी हूँ।
- मुशाइर (सोहिल मकवाणा)
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