वो कहती थी मैं एक दिन चली जाउंगी मेरा यक़ीन कर लो, मुझे क्या पता था उसकी वो ख्वाहिश खुदा इतनी जल्द मुकम्मल कर लेगा,
हाँ वो सलामत ही है, बस मेरे साथ नहीं है। नहीं जानता मैं वो कहाँ है किस हाल में है, क्या कर रही है, वो भी कुछ लिख रही है क्या मेरी तरह?
वो कहती थी उसे मेरे लफ़्ज़ों की ज़रूरत नहीं क्योंकि वो मेरे दिल से जुडी है, वो तो मेरे दिल के लफ़्ज़ों को यूँ ही ऐसे ही सुन लेती है, इतना वक़्त हुआ उसने मेरी एक भी आवाज़ नहीं सुनी? क्या उसने मेरे दिल से आज़ादी ले ली? क्या उसने मेरे दिल से दुरी बना ली? वो क्यों नहीं सुन रही है सदा मेरे दिल की? वो क्यों महसूस नहीं कर रही अदा मेरी धड़कनों की? या खुदा वो सलामत तो है ना? क्यों अब वो नहीं सुन पाती मुझे? क्या वो अपने कामों, अपनी ज़िन्दगी में इतनी मसरूफ़ हो चुकी है की उसे मेरी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही? या फिर वो अब मुझे सुनना नहीं चाहती।
क्या ये ही हक़ीक़त है? क्या मेरी ख्वाहिशों का उसके दिल में उतर जाना अब लाज़मी नहीं है? क्या उसके तसव्वुर में मेरी तस्वीर आज भी छपी है? क्या उसे मेरे इश्क़ की तलब अब नहीं है? क्या उसकी रहनुमा मोहब्बत की तिश्नगी अब बुझ चुकी है?
तुम तो वही से गुज़रते हो ना उस गली से, है ना? तुम्हे वो झरोखे में खड़ी हुई दिखती है क्या? तुम्हे उसका दीदार होता है क्या? तुम्हारी उससे कोई बात होती है क्या? तुम बस मेरा इतना काम करना, अब वो मिले तो उनसे ये सब सवालात करना। मुझे इंतज़ार है मेरे सवालों पर उनके जवाबो का।
- मुशाइर (सोहिल मकवाणा)









Achha ji aisa
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