मैं 'देशभक्ति' हूँ
यूँ तो भूली बिसरी हूँ, धूल भरा मकान हूँ,
बच्चे-बूढ़ों के दिल में आज भी जवान हूँ।
यूँ तो गुम हूँ, तो कही रुकी रुकी सी चलती हूँ,
कभी-कभी मिल भी जाती हूँ, कई दिलो का अभिमान हूँ।
कही आंखों में दिखती हूँ तो कही सीनों पे चमकती हूँ,
कही सर का ताज हूँ, तो कही स्वाभीमान हूँ।
यूँ तो खुली किताब हूँ, तो कही बंद दरवाज़ा,
कही रोजाना मिलती हूँ, तो कही दो दिनों की मेहमान हूँ।
यूँ तो शीत बर्फ हूँ, तो कभी-कभी जलता अंगारा,
तैरती-डूबती नाव हूँ, जी रहा गुमान हूँ।
कही मन्दिर की आरती तो कही गुरुद्वारा का ओमकार हूँ,
मैं बौद्ध, पारसी, ख्रीस्त हूँ, मैं यहाँ बसी मुसलमान हूँ।
कही मिट्टी में दबा फूल हूँ, तो कही महकता हुआ चमन,
'देशभक्ति' हूँ 'मुशाइर', मैं इश्क़-ए-हिंदुस्तान हूँ।
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