जिनके पंखों को कतरा है, आम रिवाजो ने,
आज़ादी की कीमत उन लफ़्ज़ों से पूछो
जो ज़ब्तशुदा साबित है सब आवाज़ों में,
आज़ादी की कीमत उन ज़हनों से पूछो
जिनको कुचला मसला है, महज़ गुलामी को,
आज़ादी की कीमत उन धड़कनों से पूछो
जिनको ज़िंदा छोड़ा है सिर्फ सलामी को,
आज़ादी की कीमत उन हाथों से पूछो
जिनको मोहलत नहीं मिली है अपने कारों की,
आज़ादी की कीमत उन आँखों से पूछो
जिनके हाथ नहीं आयी है रौशनी तारों की!
- साहिबां ज़ाफ़री









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